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अध्याय 27 — ट्रेवन का शयनकक्ष
रंगों की एक धड़कन ट्रेवन के शयनकक्ष के भीतर कांप उठती है, मानो गहरे पानी के नीचे कोई चीज़ जाग रही हो।
ट्रेवन की आँखें एक झटके में खुल जाती हैं। वे केवल खुलती नहीं—वे प्रज्वलित हो उठती हैं।
नारंगी लपटें लाल में बदलती हैं, फिर पिघले हुए पीले रंग में बहने लगती हैं, मानो काँच के पीछे कोई तूफ़ान कैद हो। उसकी पुतलियों के भीतर सफ़ेद प्रकाश की एक पतली रेखा चमकती है—इतनी तीखी जैसे कोई तारा बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो।
वह धीरे-धीरे, नियंत्रित साँस छोड़ता है।
कुछ गड़बड़ है।
कमरा अँधेरा है, लेकिन यह रात का स्वाभाविक अँधेरा नहीं।
यह ऐसा महसूस होता है जैसे भीतर से खोखला कर दिया गया हो। चाँदनी संगमरमर के फ़र्श पर चाँदी की एक पतली रेखा खींच रही है।
उसके बगल में, रूबी चादरों में सिमटकर सो रही है। उसका चेहरा तकिए में छिपा हुआ है। उसकी साँसें धीमी, शांत और स्थिर हैं—इस भारी सन्नाटे के बीच एक नाज़ुक लय।
उसके बाल बिस्तर पर स्याही की चोटियों की तरह बिखरे हुए हैं, जिनमें चाँदनी हल्की-सी नीली चमक भर रही है।
ट्रेवन बिना यह समझे उठ खड़ा होता है कि क्यों।
उसका शरीर उसके मन से पहले हरकत करता है—सहज प्रवृत्ति... या शायद कुछ और।
उसके नंगे पैर ठंडे फ़र्श को छूते हैं।
वह धीरे-धीरे अपनी पतलून पहनता है।
बेल्ट कसता है।
टक।
उसका जबड़ा एक बार तनता है—एक छोटा-सा, नियंत्रित कंपन—मानो वह किसी ऐसी चीज़ के लिए स्वयं को तैयार कर रहा हो जिसका उसे अभी तक नाम भी नहीं पता।
वह अपना पिस्तौल उठा लेता है।
धड़ाम!
दूर कहीं लॉज के भीतर काँच टूटने की आवाज़ गूँजती है।
ट्रेवन वहीं थम जाता है।
उसके चेहरे पर घबराहट नहीं आती—वह और अधिक तीक्ष्ण हो जाता है।
उसकी आँखें सिकुड़ती हैं। उनके भीतर घूमते रंग एक सघन भँवर में सिमट जाते हैं।
सफ़ेद प्रकाश की वह पतली रेखा फिर चमकती है—इस बार पहले से कहीं अधिक तेज़, मानो कोई चेतावनी हो।
हवा बदल जाती है।
ट्रेवन अपना सिर हल्का-सा झुकाता है।
वह सुन रहा है।
नहीं...
वह हवा को महसूस कर रहा है—उसे परख रहा है—ठीक वैसे जैसे कोई शिकारी अपने क्षेत्र में किसी अजनबी की उपस्थिति को भाँप लेता है।
उसकी आँख हल्की-सी फड़कती है।
वह दरवाज़े की ओर देखता है।
पिस्तौल की पकड़ पर उसकी उँगलियाँ और कस जाती हैं।
फिर से सन्नाटा।
बहुत ज़्यादा सन्नाटा।
ट्रेवन आगे बढ़ता है।
हर कदम धीमा...
सटीक...
नियंत्रित...
मानो वह किसी ऐसे सपने में चल रहा हो जिसे वह पहले भी देख चुका है।
तीसरी मंज़िल — राजा के लॉज का गलियारा
गलियारा जितना ठंडा होना चाहिए, उससे कहीं अधिक ठंडा है।
ट्रेवन केवल सफ़ेद टैंक टॉप पहने अपने कक्ष से बाहर निकलता है। उसकी मांसपेशियाँ पतले कपड़े के नीचे तनी हुई हैं और उसका कैनन पिस्तौल सामने तना हुआ है।
सन्नाटा अस्वाभाविक रूप से लंबा खिंचता जा रहा है।
एक दरवाज़ा चरमराता है।
वेरोनिका बाहर आती है।
उसका चोगा उसके चारों ओर किसी मुलायम परछाईं की तरह लहरा रहा है।
उसके बाल कपड़े में लिपटे हैं, कुछ ढीली लटें उसके गाल को छू रही हैं।
उसकी आँखें चौड़ी हैं।
वह केवल डरी हुई नहीं है—
वह सतर्क है।
मानो वही अनहोनी वह भी महसूस कर रही हो।
वेरोनिका (फुसफुसाते हुए)
"क्या हो रहा है...?"
उसके अंतिम शब्द पूरे भी नहीं होते कि ट्रेवन बिजली की तरह हरकत करता है।
वह उसकी कमर पकड़कर उसे तेज़ी से उसके कमरे के भीतर खींच लेता है।
उसका हाथ उसकी पीठ पर मजबूती से, मगर सुरक्षा के भाव से टिक जाता है।
उसका पिस्तौल एक पल के लिए भी नीचे नहीं होता।
वह अब भी बाहर की ओर तना है, गलियारे की हर हलचल पर नज़र रखे हुए—मानो कोई जंगली शिकारी अपने शिकार की आहट खोज रहा हो।
वह उसके छोटे-से दरवाज़े की खिड़की तक जाता है और शीशे से बाहर झाँकता है।
उसकी साँसें नियंत्रित हैं।
लेकिन उसका जबड़ा अब भी कसा हुआ है।
उसकी आँखों में फिर वही तूफ़ान घूम रहा है—
नारंगी...
लाल...
पीला...
ट्रेवन
"मैंने काँच टूटने की आवाज़ सुनी है। यहीं रहो।"
वह मुड़कर जाने लगता है—
वेरोनिका
"ट्रेवन... रुको।"
वह रुक जाता है।
धीरे-धीरे।
बस इतना मुड़ता है कि उसे देख सके।
वह डरी हुई है।
और इतनी सुंदर...
कि उसे देखकर ऐसा लगता है मानो उसने उसे किसी पुराने सपने में पहले ही खो दिया हो।
उसके चेहरे की कठोरता हल्की पड़ जाती है।
उसकी आँखों का तूफ़ान धीमी चमक में बदल जाता है।
ट्रेवन (धीमे, कोमल स्वर में)
"मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।"
ये शब्द उसके होंठों से ऐसे निकलते हैं जैसे कोई स्वीकारोक्ति, जिसे कहने का उसका इरादा कभी था ही नहीं।
वह उसकी ओर बढ़ता है।
धीरे...
नपे-तुले कदमों से।
वेरोनिका की साँस अटक जाती है।
उसकी आँखों में भय...
लालसा...
और उलझन...
तीनों एक साथ चमक उठते हैं।
ट्रेवन उसके पास पहुँचता है।
वह उसकी कमर को थामता है, उसे अपने करीब खींचता है और उसे एक गहरे, लंबे चुंबन में बाँध लेता है—ऐसा चुंबन जिसमें वर्षों से दबा हुआ स्नेह और तड़प बह रही हो।
वेरोनिका का चोगा थोड़ा-सा खिसक जाता है और उसका कंधा चाँदनी में दिखाई देने लगता है।
ट्रेवन के हाथ उसकी पीठ तक सरक जाते हैं और उसे अपने और निकट खींच लेते हैं।
वेरोनिका की उँगलियाँ उसके टैंक टॉप को कसकर पकड़ लेती हैं।
उनकी साँसें एक-दूसरे में घुल जाती हैं—ठंडी हवा के बीच गर्माहट की तरह।
वह पूरी तरह उसके आलिंगन में ढल जाती है।
दोनों का यह क्षण...
उनकी तेज़ धड़कनों के साथ...
और गहरा होने ही वाला होता है—
धड़ाम!
नीचे कहीं एक और खिड़की टूट जाती है।
यह आवाज़ उस पल को किसी कटाना की धार की तरह बीच से चीर देती है।
ट्रेवन तुरंत पीछे हट जाता है।
एक पल की भी हिचकिचाहट नहीं।
उसके चेहरे पर फिर वही कठोर, एकाग्र भाव लौट आते हैं।
उसकी आँखों का तूफ़ान फिर भड़क उठता है।
वह दरवाज़ा खोलता है।
बाहर निकल जाता है।
दरवाज़ा उसके पीछे एक धीमी, निर्णायक "क्लिक" की आवाज़ के साथ बंद हो जाता है।
कुछ ही क्षण बाद—
अराजकता।24Please respect copyright.PENANAbGvt93LIxA


